कोरोना नकारात्मकता को रखें अपने से दूर. ध्यान डाइवर्ट करें और रहें स्वस्थ : तारन प्रकाश सिन्हा IAS

Coronavirus COVID-19 medical test vaccine research and development concept. Scientist in laboratory study and analyze scientific sample of Coronavirus antibody to produce drug treatment for COVID-19.

Shri. Taran Prakash Sinha
IAS

कोरोना के कारण भयावह होती जा रही स्थिति से अब शरीर के साथ-साथ हम सबके मन पर भी गहरा प्रभाव पड़ने लगा है. रोज-रोज समाचार पत्र-पत्रिकाओं टीवी चैनल्स, सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों में वही सब चीज देख-पढ़-सुनकर हम शरीर से ज्यादा मन से बीमार होते जा रहे हैं. कोरोना की नकारात्मकता से हम सकारात्मक चीजों से धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं. अगर हमें इससे बचना है तो अपने ध्यान को डाइवर्ट करना होगा और कोरोना पर उतना ही चर्चा और चिंतन करना होगा जितना बहुत आवश्यक हो. बाकी समय रचनात्मकता मैं लगाएं.
कुछ ऐसा ही संदेश दे रहे हैं आईएएस तारण प्रकाश सिन्हा जी. आप जनसंपर्क संचनालय रायपुर, छत्तीसगढ़ में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं. कोरोना की इस नकारात्मकता को दूर करने के लिए समय-समय पर आप विभिन्न प्रेरक (मोटिवेशनल) लेख लिखते रहे हैं. साथ ही दूसरे समसामयिक विषयों पर पर भी आपकी लेखनी ने पूरे देश में आपको एक नई पहचान दी है.

प्रस्तुत है उनका नया मोटिवेशनल आलेख :-

नदी में स्नान के लिए उतरा एक व्यक्ति अचानक तेज धारा बहने लगा तो किनारे खड़े लोगों में चीख-पुकार मच गई। लोग कहने लगे, डूब गया, डूब गया। धारा बहुत तेज है। यह सुनकर बहते हुए व्यक्ति ने भी हाथ पैर डाल दिए। सबने सोचा कि डूब ही गया। लोगों की भीड़ तट पर ही थी कि कुछ देर में वही व्यक्ति नदी के किनारे-किनारे एक साधु के साथ आता हुआ दिखाई पड़ा। लोगों ने पूछा-यह चमत्कार हुआ कैसे। तब साधु ने कहा कि यह बहकर दूर चला गया था। वहां प्रवाह कम था और इसे विचार आया कि बचा जा सकता है। उसके विचार ने उसे बचा लिया।

कई बार हम संकट में फंस जाते हैं, तब ऐसी ही नकारात्मक आवाजें हमारे संकट को और गहरा कर देती हैं। इन आवाजों से यदि बचा जा सके तो संकट से भी बचा जा सकता है। इस कोविड-काल में महामारी का संकट जितना बड़ा है, उससे बड़ा संकट नकारात्मकता का है। इस नकारात्मकता से हमारा मनोबल कमजोर होता जा रहा है। हमारे चारों और तमाम तरह के सूचना स्रोत तरह तरह की सूचनाएं परोस रहे हैं। इनमें थोड़ी ही काम की होती हैं। जैसे आवश्यकता से अधिक भोजन हमें बीमार कर देता है, उसी तरह अनर्गल सूचनाएं भी हमारे संकट को गहरा कर देती हैं।

इस समय, जबकि कोविड-19 की दूसरी लहर चरम की ओर है, सब ओर एक सामूहिक-हताशा नजर आती है। टेलीविजन पर, अखबारों में, सोशल मीडिया पर हम हर पल कोविड-19 से ही जुड़ी बातें देख-सुन रहे हैं। हम हर पल कोविड-19 के बारे में कुछ न कुछ नया जानना चाहते हैं। यह अलग बात है कि हम नया कुछ भी नहीं जान पाते। जब कोविड-19 की शुरुआत हुई थी, तभी से हमें पता था कि यह एक नयी बला है, हमें यह भी पता था कि यह बला इतनी आसानी से टलने वाली नहीं, जब पहली लहर आई थी तब हमें पता था कि दूसरी लहर भी आएगी, और भी बहुत सारी बातें। इन दिनों हमें जो सूचनाएं मिल रही हैं, उनमें इन्हीं की पुनर्रावृत्ति हो रही है। हम जिन बातों को जानते थे, उन्हें ही घटित होता देखकर निराश हो रहे हैं।

सामूहिक हताशा घनी होती जा रही है तो क्या इस समय सब कुछ बुरा ही बुरा घटित हो रहा है। जी नहीं, बहुत कुछ अच्छा भी हो रहा है। हर रोज लाखों लोग कोरोना को परास्त कर रहे हैं, हर रोज लाखों लोगों का वैक्सीनेशन हो रहा है, कोरोना के खिलाफ लड़ाई के लिए हर रोज संसाधनों का विस्तार हो रहा है, हर रोज लाखों योद्धा मैदान पर उतरकर कोविड से उपजी परिस्थितियों को आसान करने के लिए उसका मुकाबला कर रहे हैं। ये पौष्टिक-सूचनाएं हम तक उतनी तादाद में नहीं पहुंच पातीं, जितनी कि नकारात्मक-सूचनाएं। देखना यह होगा कि हम दिनभर में किन-किन माध्यमों से कितनी सूचनाएं ग्रहण कर रहे हैं। उन माध्यमों का चरित्र कैसा है। वे एक माध्यम होने के नाते अपनी नैतिकता को लेकर कितने सजग हैं। उनका उद्देश्य क्या है। जो सूचनाएं हम तक पहुंचती हैं, उसी से हमारी मनोदशा तय होती है। हमारे मनोबल की मजबूती या कमजोरी तय होती है। मन और तन ये दोनों जुड़े हुए विषय हैं। मन अच्छा होगा तो तन अच्छा होगा, तन अच्छा होगा तो मन भी अच्छा होगा।

कोविड-19 के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार इम्युनिटी लेबल ही है, हमारे मन का अच्छा या बुरा होना भी हमारी इम्युनिटी तय करता है। कौन नहीं चाहेगा कि उसकी इम्युनिटी अच्छी हो। यह संभव नहीं है कि हम तमाम सूचना माध्यमों से अचानक दूर हो जाएं, अथवा उनमें आ रही नकारात्मक सूचनाओं को छान सकें, लेकिन यह अवश्य संभव है कि हम नकारात्मक सूचनाओं को स्वयं तक पहुंचने से रोकें और सकारात्मक चीजों को अपने वातावरण में ज्यादा स्थान दें। ज्यादातर शहरों में लाकडाउन अथवा लाकडाउन जैसे हालात हैं। ज्यादातर लोगों का ज्यादातर समय घरों पर ही बीत रहा है। क्यों न हर सुबह की शुरुआत एक बढिय़ा भजन, एक बढिया संगीत से की जाए। क्यों न अपने प्रिय गायकों के गाये गीत कतार से सुन लिए जाएं, क्यों न वह किताब पढ़ ही ली जाए जो न जाने कब से हमने अलमारी में सजा रखी है, क्यों न बच्चों के साथ कैरम खेल लिया जाए, क्यों न रसोई में कुछ नया सीखा जाए, क्यों न घर की दीवारों और दरवाजों को खुद ही चमका लिया जाए, क्यों न गमलों को थोड़ा व्यवस्थित कर लिया जाए, क्यों न कुछ नये बीज डाल दिए जाएं, क्यों न छत पर उतरे किसी नये परिंदे को निहारा जाए, उस पर एक कविता ही लिख ली जाए ।

जब हम कुछ ऐसा कर रहे होंगे, तब भी कोविड के खिलाफ जंग उतनी ही शिद्दत के साथ लड़ी जा रही होगी, लेकिन तब उसमें ताकत नयी होगी। जीत ज्यादा करीब होगी।

“रात भर का है मेहमान अंधेरा
किस के रोके रूका है सवेरा…”

“रात जितनी भी संगीन होगी,
सुबह उतनी ही रंगीन होगी…”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here